"उल्फ़त की आँधियों में इज़ाफ़ा न कीजिए"
दुनिया का हाल जानिए या कुछ भी कीजिए,
हमसे हमारा हाल भी पूछा तो कीजिए।
ऐसा लगा कि रौशनी हिस्सों में बंट गयी,
दहलीज़ से बालिस्त भर झांका न कीजिए।
बागों की बात और है पनघट की बात और,
उल्फ़त की आंधियों में इज़ाफा न कीजिए।
आंचल में ॠतुराज का सौंदर्य बांधकर,
किसी के मन का सब्र यों आंका न कीजिए।
धूप व काली घटा अलग-अलग हैं खूब,
अलकों से किरण पुंज को ढांपा न कीजिए।
---प्रदीप सेठ सलिल

