कोयल करूणा गीत गा रही शायद तुम विरहा गाती हो।


कलियों का हंसना शर्माना 

कोयल का मृदु गाना गाना,

पवन, पल्लवों की अठखेली

बागों  में  मुस्काहट  आना,

सब रूखा रूखा सा लगता शायद तुम विरहा गाती हो।


प्रात:  की नटखट अंगड़ाई

खुशियों की अविरल परछाई,

मौसम की ये शोख़ अदाएं,

परियों वाली गज़ल रूबाई,

सब कुछ रूठा रूठा लगता  शायद तुम विरहा गाती हो।


मधुशाला साक़ी शराब सब,

मतवाली खुशबू बहार अब,

जोबन  की  बेचैन  निगाहें,

मतवाले बचपनी ख़्वाब अब,

प्यासे प्यासे से लगते हैं शायद तुम  विरहा गाती हो।


मन्दिर के ये भवन  ठिकाने, 

गीता   के   उपदेश  पुराने,

मीरा  की  भाषा  अलबेली,

कान्हा  के  वो  खेल  फ़साने,

फीके फीके से लगते हैं शायद तुम विरहा गाती हो।


चन्द्रबदन  का  रूप  सलोना,

शबनम का  सौ आंसू  रोना,

धरती  के प्यासे  अधरों  पर,

बादल  के  अधरों  का  होना,

सब अद्भूत धोखा लगता है शायद तुम विरहा गाती हो।


---प्रदीप सेठ ‘सलिल’