'भोर की पहली किरण तुमसे है काम'
भोर की पहली किरण तुमसे है काम
रात के अलसाए सागर से निकल कर
जब सुबह उस द्वार पहुँचो
अरगनी पर टांगना खुशियाँ
किसी के नाम,
भोर की पहली किरण तुम से है काम
पौष की ठण्डी हवाओं
जब परिंदे गीत गाऐं
वृक्ष डालों को झुलाऐं
उस समय तुम गुनगुनाना
बांटना आराम
किसी के नाम
भोर की पहली किरण तुम से है काम
भावना के द्वीप के पहले सपन
जब सुबह से पूर्व आंखों पर सजो
श्रृंगार की मेहंदी हथेली पर रचो,
उस समय तुम भेंट करना
स्नेह का हर याम,
किसी के नाम,
भोर की पहली किरण तुम से है काम।
---प्रदीप सेठ सलिल

