दर्द का अपना सफर कुछ इस तरह तय कर लिया,
ज्यों किसी बसन्त ने पतझर से दामन भर लिया।
अतीत की जाली से छनकर कल के किस्से आ रहे,
इक फ़सल काटी औ’ दामन दूसरी से भर लिया।
बर्फ़ की तरह पिघलना था किसी के प्यार का,
और किसी खारे समुन्दर ने नदी को हर लिया।
भावना को शब्द, भाषा, स्वर सभी उपलब्ध हैं,
फिर भी आंखों के गगन ने ख़ुद को सावन कर लिया।
आयु की भित्ति में अद्भुत सोच की खिड़की खुली,
उससे मन में वेदनामय युग का मौसम भर लिया।
---प्रदीप सेठ “सलिल”

