'अश्रु तुम्हारे दृग का बनकर आंखों में सज जाता.'
अश्रू तुम्हारे दृग का बनकर आँखों में सज जाता,
और बांध पाजेब लहर को बूंदों में बंट जाता,
मन में छवि तुम्हारी, पर हो, यह संभव सब कैसे?
प्यासों की मजबूरी पढ़ने मैं मरुथल तक जाता।
--प्रदीप सेठ "सलिल"


'अश्रु तुम्हारे दृग का बनकर आंखों में सज जाता.'
अश्रू तुम्हारे दृग का बनकर आँखों में सज जाता,
और बांध पाजेब लहर को बूंदों में बंट जाता,
मन में छवि तुम्हारी, पर हो, यह संभव सब कैसे?
प्यासों की मजबूरी पढ़ने मैं मरुथल तक जाता।
--प्रदीप सेठ "सलिल"