"जब हँसी ममता धरा पर विश्व फिर बचपन बना है"


मुस्कुराया है ह्रदय तो अश्क़ भी शबनम बना है,

आह इक कविता बनी है शूल भी गुलशन बना है।


मुस्कुराने से कभी  क्या  दर्द की वर्षा हुई है,

प्रेम पुरवाई चली है  काल भी जीवन बना है।


जब कभी कलियाँ खिलीं तो बाग से पतझर गया है,

मुस्कुराई  हैं  घटाऐं  तब  कहीँ  सावन  बना है।


नित्य सूरज की हंसी में  रात की रंगत उड़ी है,

मुस्कुराए  हैं  परिन्दें  प्रातः तब  प्रातः बना  है।


नयन का मिलना व झुकना प्रीत का पर्याय पुलकित  

ज़िन्दगी का मुस्कुराना  स्नेहमय यौवन  बना है।


रूप का सागर हंसा तो  प्यार की लहरें उठी हैं 

काव्य को वाणी मिली  श्रृंगार रस  गायन बना है।


अश्रु का हंसना तनिक भर  गीत की दो पंक्तियाँ  हैं,

जब हंसी ममता धरा पर,  विश्व फिर बचपन बना है।

--प्रदीप सेठ सलिल