'पर कोई सावन पलक से मेह बरसाने लगा'
मैं किसी के प्यार की जब भी कसम खाने लगा,
आपका ही नाम होठों पर मेरे आने लगा।
मैंने माना मैं किसी सहरा का एक विस्तार हूँ,
पर कोई सावन पलक से मेह बरसाने लगा।
सूखे पत्ते का चटक कर टूटना आसान है,
अब नही संभव नमी यादों की मैं पाने लगा।
शोर के सागर में सन्नाटा मेरी पतवार है,
मेरी चुप्पी से मेरापन घन्टों बतियाने
लगा।
लो क्षितिज पर आ गयी आशा तनिक सी देर को
मन-दिशाओं में नया मंज़र नज़र आने
लगा।
---प्रदीप सेठ सलिल

