युग गुज़र गए हैं यों तुमको निहारते,
मेरे लिए लहर न आई उस कगार से,
आप ध्वनि की तरह आओ जो आ सको
नि:शब्दता बंधी है समय के सितार से।
--प्रदीप सेठ "सलिल"


युग गुज़र गए हैं यों तुमको निहारते,
मेरे लिए लहर न आई उस कगार से,
आप ध्वनि की तरह आओ जो आ सको
नि:शब्दता बंधी है समय के सितार से।
--प्रदीप सेठ "सलिल"