'पक्षी उड़ा अश्क़ लिए'
गुब्बारे में हवा भरी
इतनी
वो फूट-फूट गया,
हँस मुख एक दर्पण
अनजाने टूट गया।
पक्षी उड़ा अश्क़ लिए
दूर दूर दूर तक,
महकाया मेह फ़िर
बरसा सुदूर तक,
शिशु-मन शिशु रहा,
जान नही पाया वो
अंबर क्यों रूठ गया
दर्पण क्यों टूट गया
गुब्बारा फूट गया।
---प्रदीप सेठ “सलिल”

