लो ये कैसी किस्म के इंसान होते जा रहे,

लोग अपने घर में ही मेहमान होते जा रहे,

अब कहाँ फ़ुर्सत के मिलके साथ बैठें दो घड़ी

शहर जितना फ़ैलते  वीरान होते जा रहे।

--प्रदीप सेठ "सलिल"