कई दिनों से मैं जातिगत भेदभाव और कट्टरपंथी विचारधाराओं का सामना कर रहा हूं, मुझे नहीं पता आगे क्या होगा, मगर ये तय है आज भी हम कितने ही क्यूँ ना मॉडर्न बन जाए लेकिन जो विष समाज मे फैला है जात पात का वो ना कल खत्म हुआ ना आगे होगा,

समाज की मानसिकता कुंठित है, कितने बच्चे जातिगत भेदभाव की बलि चढ जाते है, ज्यादा इतिहास में ना जाए तो हम सम्भवत तीसरी पीढ़ी है देश की आजादी के बाद, कई वर्षो के बीत जाने के बाद भी लोगों की मानसिकता, नजरिया उनकी सोच वैसे ही है, जैसे कई बरसों पहले जब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने इस बीमारी का समाधान निकाला था, कहने को हम 21 ईस्वी सदी में रह रहे है, मगर आज की राजनीति की बुनियाद यकीनन जाति ही है, जिसकी वजह इसमे धुआ उड़ता रहता है! कहीं आरक्षण को लेकर नेता रोटियां सेक रहे है तो कहीं समाज के एक तबकों को इसके प्रति गुस्सा भरा है ! संसार में लोग अब मॉडर्न प्रकृति के होते जा रहे मगर भारत विभिन्नताओं का देश होने के बाद भी बहुत संकरी मानसिकता का है

हिन्दी सिनेमा चित्र पट में ऐसी कई सामाजिक मूवी बनी है समाज को जागरूक करने के लिए मगर उसका निष्कर्ष भी बहुत ज्यादा दिखाई नहीं देता है,

अध्यात्म को मानने वाले वेद पुराण को समझने वाले भी इंसान की महत्व को नहीं समझते अगर भगवान का अस्तित्व है और वो सबमें रहता है तो कोई छोटा बड़ा नहीं है,

"कहते हैं रिस्तों की डोरिया ईश्वर बनाता है " ये कथन कहा तक सत्य है?

रिस्तों के धागे जमीन पर तय होते हैं, मगर समाज के ठेकेदार उन रिस्तों को कुचल देते जो रिश्ते स्वयं ईश्वर तय किया होता है

आज कई ऐसे मेरे मित्र है औऱ कई समान्य दोस्त है जिन्होंने इस भयानक परिस्थिति का सामना किया है,

ऊपर बैठा ईश्वर भी इंसान की कुकर्मी को देख कर हंसता होगा कि भेजा था इंसान मगर ये सब शैतान बन गए,

दो प्रेमी जोड़ों को जबरन जब अलग किया है तो उसकी तकलीफ हजार बार मौत के बराबर होती है,

धर्म के ठेकेदार, जातिवाद के संरक्षक, सामाजिक वेदना के प्रमुख सिपाही है,

ऑनर किलिंग की वजह से कितने बच्चों को इस हस्ती खेलती दुनिया से विदा किया गया है,

भारत सरकार ने आनर किलिंग के खिलाफ 2019 बिल पारित किया, ये अभी तक पूङतः कानून नहीं बना है मगर धारा 300 के अंदर कुछ कानून जरूर कायम किए हैं

जो भी व्यक्ति प्रेमी युगल को शारीरिक हानि पहुंचाएगा उसको आजीवन कारावास और कुछ हद तक 5 लाख का जुर्माना भी परिणित है, राजस्थान इस कानून को स्वीकार करने वाला पहला राज्य हुआ!

कितने बच्चे मानसिक वेदना, उलझन में इस भौतिक शरीर को त्याग देते है और इस सांसारिक जीवन से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाते है,

भारत मे 4 मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है, यानी कि हर 12 मिनट में 3 युवा जो (20-30) आयु के लोग अपनी जान गावा देते है

पारिवारिक ,सामाजिक, प्रेम-विवाह की समस्याओं में 38% लोग आत्महत्याएँ कर लेते है,

इतनी भयावह भरी स्थिति है देश की परंतु इसकी जानकारी किंचित लोगों को ही पता होगा,

समस्या दूसरी पीढ़ी की है जिनमे अभी भी बहुत जातिवाद भरा पड़ा है, और ये तीसरी पीढ़ी को इसका भुगतान करना पड़ रहा है !

हर इंसान को अपनी स्वतंत्रता प्यारी है मगर समाज की पाबंदियां ने इस स्वतंत्रता को सीमित रखा है,

माँ और बाप कहा तक सही होते इस मामलों मे?

एक औरत तभी माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त करती है जब वो इस दुनिया मे नवजात शिशु को जन्म देती है,

यकीनन उस बच्चे को जन्म देने 9 महीने तक अपने गर्भाशय मे रखना ये उनकी अपनी शक्ति है कई तकलीफों का सामना करके बच्चे को जन्म देती है, बच्चे बड़े होते है उनके बताये हुए रास्ते पर चलते है, मगर अगर प्यार किसी विपरित जात मे कर ले तो ये कहा तक सही है कि उस बच्चे की खुशी, जिंदगी हमेशा के लिए अंधकार में डाल दे ,

आज समस्या वही है जो आजादी से पहली थी बस लोगों का लिवाज बदला है मगर सोच वही है पिछड़ापन की,