Poetry 1 min read 383.7K reads

बागी


प्लेटफॉर्म पे कईयोंको देखते है अशांत मनकी पीड़ा लिए कुछ करने कीचाहत से हर रोज जिल्लत उठते है,हम इंसान ही है जो दूसरों को समझनहीं पते है,ये उच्च ओहदे और मौकापरस्तीकी आदतों सेकितने बेचारे बागी बनजाते है,

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