साया


अँधेरी रातों में ,

वो अब भी मुझे पुकारता है !

मेरा साया है वो ,

जो मुझे सरेआम ललकारता है !


मुझे देख कुंठित ,

वह खुद पर इतराता है !

मेरे अकेलेपन को देख ,

वो ख़ुशी से झूमता है , चिल्लाता है !


प्रश्न उसके तीखे ,हैं कटीले

मैं निरुत्तर हूँ खड़ा ,

और वो मेरी ख़ामोशी पर मुस्कुराता है !


किसी की हँसी समझ प्यार ,

और उस पर समेत अपना सारा संसार ,

इंसान अंत तक पछताता है !

क्षणिक आकर्षण है प्यार ,

मेरा साया मुझे समझाता है !


मैं वो विजेता खिलाडी हूँ ,

जो हर बाजी हार जाता है !

खिलौना बन किसी और का ,

अपनी खुशियाँ लुटाता है !


आज अकेलेपन में मुझे ,

मेरा बिता कल याद आता है !

अपना सच्चा साथी मैं ,

मेरा साया मुझे बताता है !


~प्रदीप कुमार वर्मा