नयन अधखुले ,हल्की सी मुस्कान
और अंगड़ाइयों से द्वंद ,
प्रेम में पड़े प्रिय के
बंद आंखों में भी रहते है प्रेम छंद
स्वप्न भोर के होते है सच ,
सच यह मान कर ,
वह जाग कर भी,
मुंह ढक सोता है ।
क्षणिक ही सही ,
यह भ्रम सब को प्रिय है ।
प्रिय से मिलन या बिछोह,
प्रेम शाश्वत अमर होता है ।
प्रेम निश्चल हो तो
मरुभूमि में भी है
गुलाबों की सुगंध ।
प्रेम का धागा जुड़ा रहता है
प्रिय दूर रहे या संग ।

