गाँव-गमन
भारत बसता है गाँवो में,
चलो अब गाँव-गमन करे !
शहर के अवहेलना को,
अब और न सहन करे !
संस्कारित हुई यहाँ मानवता ,
चलो अब इसी पथ का चयन करे !
भीड़ में खोये रिश्तो को पहचाने ,
हृदय से निभाने का वचन दे !
भावना शून्य बंजर भूमि छोड़ ,
अब हरितिमा की ओर बढ़े !
मन का विश्वास यही ,
खुशियाँ यही समीप है !
शहर जलता सूरज ,
गांव शाश्वत 'प्रदीप' है !
आओ ! ऊधर्वगामी ज्योत का ,
हम सब अनुकरण करे !
बढे उसी पथ में ,
जो हृदय प्रसन्न करे !
प्रदीप कुमार वर्मा
