बारिश की आश में

सुख रहा तरु!


तन सिंचित ,

पर मन प्यासा ,

अचंभित , अकेला

सोचता है क्या करू !


जीवन पर सुख के लिए जिया

प्रेम भाव से सेवा किया

बारिश का कारण बना

पर बूंद न स्वयं पिया


मन में अब ये आश जगा

बीज मेरा ही उगा

अब यह करेगा

जग का जतन

मेरा साथ अब

यही पर खत्म हुआ !