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परदे के उस पार
रहती है कोई जिन्दगी I
इसका नही था कोई इल्म मुझे
शायद मुझे कभी दिख नही पाया
उनके अविराम गर्दिशों का साया ।
एक दिन सहसा
उस अबोध बच्चे की जिद ने
हटा दिया वो परदा
जिसकी आड़ लेकर
सिसक रही थी बेबस जिंदगी ।
बरसों की उसकी तपस्या का फल
ऐसा भी हो सकता है
कभी सोचा ना था मैने ।
गैरों को सहारा देकर
उठने वाले उस जवान के कंधे
गिर जाने की इतनी बड़ी सजा मिली ।
अकेली कहानी नही है बस यही
परद

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