प्रेम किया उसने तुम्हे छायावाद में
छंद हीन, तुम्हे पसंद आयी नई कविता
प्यास भूझाई तुमने नल कूपो से
छोड़ के अविरल बहती सरिता।
पर्वत श्रृंखला नहीं ,एक दिवीय श्रृंखला
जीवन का कठोर तप नहीं छन भर की चंचलता
भूलकर गौरैया से भरा आंगन
दूरदर्शन पर देखे तुमने पक्षी और पुष्पलता।
सावन के नभ सा अवसादों में घिरा है
यादों की तपिश से दिल झुलसा जाता है
प्रेमी की अस्थियां ले जा रहे है सब
मै कहता हूं किसी के धोखे का जलसा जाता है।


