तुमने क्या सोचा कभी ?

संसार ये गहरा कुआँ !

अनगिनत आए-गए,

अमरत्व को किसने छुआ !


ये महल है इसको देखो,

चर्चा इसकी थी कभी ।

हिल गई है नींव अब तो,

जर्जर है दीवारें सभी ।।


तू पथिक बेचैन क्यूं है ?

पथ पकड़ बस चलता जा।

छोड़ दे ये ढीठपन,

हर परिस्थिति में ढलता जा ।।


कर ले हासिल लक्ष्य सब,

जो भी तेरे हद में है।

कूद जा तू युद्ध में,

फौलाद तेरे रग में है।।