हे मातृभूमि के रखवाले,

तप कर हर क्षण लड़ने वाले,

गल कर हर क्षण जगने वाले,

बोझिल कंधों से चलने वाले।।


तुम इतने दृढ़ कैसे बनते हो,

कठिनाई हर दिन सहते हो,

घरवालों से क्या कहते हो?


मां से क्यों अपनी झूठ बोलते ?

फिर खुशियों का वजन तोलते,

कहते हो कि सब अच्छा है,

 मस्त मौज में तेरा बच्चा है,



भोली मां को समझाते हो ,

मनगढ़ंत बात बताते हो,

आभास जिसे हर क्षण का है 

तुम उसको भी झुठलाते हो।



गलती इसमें नहीं तुम्हारी

कंधों पर है जिम्मेदारी ।

अनगिनत अपार दुख सह सकते हो

फिर भी अडिग रह सकते हो।।




कर्ज मिट्टी का करते हो अदा।।

हे वीर तुम्हारी जय हो सदा।


~प्रभात सिंह