प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है 

माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है 

भूल कर अपनी सारी खुशियां 

हमको मुस्कुराहट भरा समंदर दे जाती है 

अगर ईश्वर कहीं है ,उसे देखा कहाँ किसने 

माँ धरा पर तो तू ही ,ईश्वर का रूप है 

हमारी आँखों के अंशु ,अपनी आँखों में समा लेती है 

अपने ओंठों की हंसी हम पर लुटा देती है 

हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती है 

दुःख में हमारे आंसू बहाती है 

हम निभाएं न निभाएं 

अपना फ़र्ज़ निभाती है 

ऐसे ही नहीं वो करुणामयी कहलाती है 

व्यर्थ के प्रेम के पीछे घूमती है दुनिया 

माँ के प्रेम से बढ़कर कोई प्रेम नहीं है 

आवाज़ में उसके शब्द मृदुल हैं 

ममता रूपी औरत के प्रेम में देवी है 

अपलक निहारूं उसके रूप को 

ऐसी करुणामयी प्यार की मूरत है  

प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है 

माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है.....