पिछे मुड़कर देखू कैसे -
पथ की दुश्वर संघर्षो में
खोयी नींद - चैन की आहट है
साम-दंड़ को लांघ चुके
बस अगली मंजिल प्रतिक्षारत है
हर वादे और शराफत को
विष -कोश का घूंट पिलाकर
होठों की स्पर्शित चाशनी और
सुनयनों की हर हामी को
धन और जाति के बंधन को
खोलने पर सबको भरमाकर ।
सत्ता , ताकत का मोह गजब है
काल कोठरी की निशा युवा है
पुराने परिचित अब मित्र कहां है
शाम ढ़ली पर , चौपाल कहां है ,
दुनिया कर ली मुठ्ठी में पर
हर विपदा में स्वयं अकेला पाते है
आभासी विश्व के मकड़जाल में
रूतबे को तौलते अर्थमानों के पैमाने से
वक्त कहां अब ,
पिछे मुड़कर भूतकालिक मान निहारने को ,
द्वंद्व में उलझा
द्रुत गति है
अब तो बस , मन की एक ही पीड़ा
सदियों तक पीढ़ियों को सवांरू कैसे
ऐसे में भला ,
पीछे मुड़कर देखू कैसे ..!
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