वो बचपन की होली कुछ अलग ही थी ...
अब इस होली में वो बात नहीं ...
वो बचपन की होली में हमजोली संग हुड़दंग मचाते थे...
जो रंग ना लगवाए उसे दौड़ा-दौड़ा के रंग में नहला डालते थे ...
वो होली के रंग भरे गुब्बारे वापस लौट के हम ही पे फोड़े जाते थे ...
वो दोस्त हमे रंगो से सराबोर क्र डालते थे ...
अब इस होली में वो बात नहीं ...
वो सुबह से रंग भरी बाल्टी तैयार रहती थी ...
अंकल हो या आंटी सबको नहलाती रहती थी ...
वो गुझियों की मिठास वो दही बड़े पे मीठी से चटनी की बात ....
अब इस होली में वो बात नहीं ....
वो दुश्मन का भी दोस्त बन जाना ...
सब कुछ भूलके बस गले लग जाना ...
सारी बीती बातें भूलके बस दिल स्व दिल मिलाना ...
वोहंसना वो हँसाना,रंगो के साथ भांग का रस भी चढ़ा लेना ...
सचमें वो बचपन की होली कुछ अलग से थी ...
अबइस होली में वो बात नहीं ...
अबइस होली में वो बात नहीं ...