हर हालातों से गुज़र कर देखा है
मैंने खुद से मुकर कर देखा है
लफ्ज़ खामोश हो जाते हैं अक्सर
मैंने खामोशियों में जीकर देखा है
रात नही डसती ना अँधेरा चुभता है
रातों का शोर दिल में बसता है
चाँद नहीं तन्हा सितारे नही बेबस
बादलों से नीर ऐसा बरसता है
क्यों बेबसी बेताबियाँ फिज़ाओ में है
क्यों बेरुखापन सभी की अदाओ में है
कहाँ मिलना है यहाँ हमे बार बार
क्यों संगदिली सबकी निगाहों में है
छू कर यूँ ही गुज़र जायेगी कभी
ज़िन्दगी कहाँ लौटकर आएगी कभी
सोना तो सभी को है मौत की बाँहों में
क्यों ना ये चंद लम्हे हम जी ले अभी...