दुखी हूं, उदास हूं, बेहाल हूं,,,, हूं क्या?

चुप हूं, बेचैन हूं, बदहवास हूं,,, हूं क्या?


जिंदगी का ये जाल समझ क्यूं नहीं आता,

मोहब्बत जिसे करते हैं वो मिलता नहीं,

जो मिलता है वो दिल को नहीं भाता..


नाराज़ नहीं हूं पर ढेरों सवाल हैं,

जो पास है मेरे बहुत अच्छा हैं,

पर सब होकर भी ना जाने कंगाल क्यूं है,


जो पास नहीं उस पर ऐतबार क्यूं है,

एक काफिर से बेइंतहा प्यार क्यूं है,


क्यूं खुद को मेहफिलों से रोके हूं,

क्यूं खुद को यू तन्हा कर दिया है,


सब है, और दुरूस्त है, यकीनन,

सब भरा है पर खाली सा क्यूं लगता है,


जिंदगी तो चलने का नाम है ना,

फिर मुड़ कर पीछे देख मलाल क्यूं है,


क्यूं लगता है कहीं मेरा इन्तजार है,

क्यूं सपनों में भी उसी चौखट पर होती हूं,


क्यूं आंखें खुलते ही सब बिखर सा जाता है,

मन भीतर तक सिहर सा जाता है,


तू अतीत है, तू दूर है, तू नाराज़ हैं, तू मगरूर है,

सालों हुए बिछड़े हुए पर मुझ में तू इस कदर जिन्दा क्यूं है,


बहुत से सवाल है मेरे जिनका कोई जवाब नहीं है,

दुनिया की नजरों में आबाद हूं मैं, कभी झांक कर देखिऐ जनाब हम सा कोई बर्बाद नहीं है..