इस जीवन के कुछ सदमे हैं,
वो सदमे ही बस अपने हैं,
चलती जाती जीवन धारा,
जो छूट गए वो अपने हैं

नासूर सा चुभता हर लम्हा,
ना नए के चाहत है दिल में,
एक ढर्रे पर चलती डग डग,
सब दर्शक हैं हम सपने है

सबकी चाहत की इच्छा को,
पत्थर सी थी मैं धूल बनी,
एक पल में गिर तेरे दिल से,
तेरे पैरो का शूल बनी

कितना दिल को तड़पाऊंगी,
कितना ही दिल को दुखाऊँगी,
तुझे चाहकर उसने की गलती,
कब तक एहसास कराऊंगी 

एक नाव सी पानी में बहती,
पटवार मेरी अब छूट गई,
जिस पल मैने उसको खोया,
किस्मत हाथों से छूट गई

मैं नहीं थी काबिल तेरे कभी,
ना मुझमें इतनी हिम्मत थी,
ये अच्छा काम हुआ रब का,
तेरे हाथों से छूट गई

अब चलती हूं मैं दूर कहीं,
अब फिर ना वापस आऊंगी,
क्या करती हूं क्या करना है,
अब ये ना कभी बताऊंगी

क्या सच्चा था क्या झूठ ही था,
अब इस हिसाब का क्या करना,
तू रहे कही मैं रहूं कहीं,
ना संग जीना ना संग मरना

फिर भी मैं ये बस चाहूंगी,
ना गम का कोई बादल हो,
प्यार करे सब तुझ जैसे,
मुझ जैसा प्यार ना हासिल हो