गुजरे हुए वक्त को कब तक मोड़ेगी,
बिखरे हुए हिस्से को कितना जोड़ेगी,
वो अब हवा नहीं रेत बन चुका है,
रेत से बने पानी से आंखें कब तक निचोडेगी
जब चाहत नहीं तो, दरवाजा क्यूं खटखटाती है,
सौ दफा चीखती है,तो एक बार आवाज आती है,
क्यूं उस बैरी के कारण, खुद को इतना सताती है,
तू कितनी गैर है उसे, उसकी रजीशे जताती है


