मनचली


घुँघरू बजाती, डगमगाती, दिल में उतर जाती है,

बाहें फैला जो न समेटूँ, फ़िज़ूल बिखर जाती है।

शिकवा ओस की बूँद-सा, होंठों पर ठहर जाता है,

साँसों की माला छूते ही, मोती-सा बिखर जाती है।

दुनिया से होकर दूर वो पगली, बादलों पर घर बनाती है,

शोख़ फ़िज़ाओं में सरसराती, हवाओं-सी उतर जाती है।

स्वप्नमाल में रखकर पिरोता हूँ उसको अक्सर रात भर,

आँख खुलती है तो वो मनचली, जाने किधर जाती है।