ख्याल-ए-महोबबत मे हम से प्रेमी भटका करते हैं,जो कस कर हाथ पकड़ते हैं अक्सर वहीं झटका करते हैं,एक हमें ही मयस्सर नहीं सुकून की रातें,इन आंखों से अब तो लहू टपका करते हैं
ख्याल-ए-महोबबत मे हम से प्रेमी भटका करते हैं,जो कस कर हाथ पकड़ते हैं अक्सर वहीं झटका करते हैं,
एक हमें ही मयस्सर नहीं सुकून की रातें,इन आंखों से अब तो लहू टपका करते हैं