आज फिर तुम हम पर एहसान कर गए,

अपने हसीन पल हमारे नाम कर गए,

हम तो यू ही गुरूर लिये बैठे थे अदाओं का,

अपनी सादगी से फिर उन्हें आम कर गए


बडे‌ साहब कहते थे, मशरूफियत का मारा हूं,

जाने कैसै चंद लम्हों में जहांन भर गए,

माना हम तकल्लुफ देते हैं याद करवाने का,

पर सच कहना क्या हम फिर से कत्ल ए आम कर गए


तू जानता तो सब है पर मानता नहीं,

कि कैसै दो दिल मिले और गुलिस्तां खिल गए,

तेरी महोबबत में मस्त हुई फिरती हूं,

तेरी महकशी नजरों से दिल के जाम भर‌ गए


हम प्यार नहीं इबादत करते हैं तेरी,

यू ही नहीं खुद को बदनाम कर गए,

आज भी हम तेरे नाम से जाने जाते हैं,

ताउम्र हर सुखन तुम्हारे नाम कर गए