एक दौर ढल गया, हस्ती बदल गई,
जाना था कहीं और,कहीं और निकल गई
तेरे शहर का पता यूं लापता हुआ,
उस रास्ते से नई, एक गली निकल गई
क्यूं रार ही करे अपने नसीब से,
ऐसा भी तो नहीं, कि ये जिंदगी फिसल गई
बस तू ही तो भला ना रहा शहर में,
नेको को देख सामने बस्ती निकल गई
तेरा हाल जान कर करूंगी अब मैं क्या,
यूं नापते जमीं, मेरी मंजिल बदल गई
ना फिक्र ही रही ना ज़िक्र ही रहा,
गिलो की आग में मोहब्बत पिघल गई
तू बन कठोर सा मैं नर्म ही सही,
मेरी परछाई ना कहे, तेरी फिदरत बदल गई


