मायूस नजरों से चलती अश्रुधार बताती है,
मेहबूब की स्मृतियां अब भी तेरा दिल दुखाती है
जब जब वो चेहरा यकायक स्मरण होता है,
सुलझी सी जिंदगी फिर से उलझ जाती है
आकांक्षाओं की बस्ती बसने को होती है,
मेरी झोपड़ी तूफान में अचानक उजड़ जाती है
सपनो के बादल ज्यों बरसने को चलते है,
तपती धूप उन पर चिल्लाती है
ज्यों करते है कोशिश दिलों से जुड़ने की,
क्यूं धड़कन अचानक बिखर सी जाती है
तेरे हिस्से को जीने कहता है तू मुझसे,
खुद के हिस्से की जिंदगी जी नही जाती है
मंहुसियत की दिवारे स्याह है अब इतनी,
रोशनदानों से भी अब रोशनी नहीं आती है
कुछ आम कुछ खास होते है शक्श अक्सर,
तेरे बिना अब कोई शक्सियत नही भाती है


