आजादी तो सबका हक है,

हम कौन हैं तुम्हें गुलाम बनाने वाले

तुम तो हमेशा से ही खास थे,

हम कौन हैं तुम्हें आम बनाने वाले


पर याद रहे

जिस जीवन की ताल पर आज नाच रहे हो,

उसका ढलाव एक दिन निश्चित है,

जिन जज़्बातों को दबाए आज फिर रहे हो,

उनका भविष्य में फैलाव निश्चित है


नाराज़ नहीं हूं, जानती हूं इस कहानी में गद्दार हमीं थे,

इन दबी रंजिशो के सिपहसालार हमीं थे,

आज उन्हें मैं खुद का आइना दिखाने चली थी,

आज भी उनके अंजुमन में फकत गुनहगार हमीं थे


भूल है मेरी, जो आज भी मखलूक में उन्हें रहबर माने बेठै है,

जिनकी जिस्त में मंजिलें ब रसते और कहीं थे,

एक वहीं है, जिन्हें जिंदगी ने शांति और संतोष से नवाजा,

एक हम बेगैरत जहां छोड़ गए आज भी वही थे