चतुराई अपनी छोड़ हे मूर्ख इंसान !

तुझको देख रहा भगवान


जिसने तुझको समर्थ बनाया

बुद्धि विवेक दे सफल बनाया

कर सके भले बुरे की पहचान

तुझको देख रहा भगवान


उसको छल के तू खुश होता

अपने विनाश का अंकुर बोता

फिर शीश पकड़ कर क्यों रोता

जब पड़े मुश्किल में जान

तुझको देख रहा भगवान


सुख तुझको खूब सुहाते

दुख तुझको कभी न भाते

कर्म तुझको कर्मठ बनाते

क्यों कर्म से मुख मोड़ता

कर्म से ही होती है

तेरी असली पहचान

तुझको देख रहा भगवान


पूनम निगम