सुनती हूँ जब इस शहर की ताल,
तब देखती हूँ अपनी मंद चाल,
रह गयी हूँ कितनी पीछे,
आँखें बंद कर मुट्ठियों को भीचे।
कहाँ भागा जा रहा है बनके लहर,
मुझसे ही मेरा ये शहर,
कुछ बातें करना रह गयी हैं बाकी,
वक्त निकलता जा रहा है काफी।
डर लग रहा है इसके खोने का,
मन हो रहा है मेरा रोने का,
अपने आप से ही लड़ रहा है रोज़,
शायद खुद को ही रहा है खोज।
वक्त के साथ कर रहा कई पड़ाव पार,
लग रहा है जैसे मान ली हो इसने हार,
बुढ़ापे ने इसको ऐसा है घेरा,
ये वही शहर है जो है मेरा।।


