खिड़की से झांककर एक शख्स देखती हूँ, 

जिसमें मैं अपना अक्स देखती हूँ, 

सीढ़ियों से उतरकर अक्सर देखती हूँ,

उसी को मैं हर वक्त देखती हूँ, 

उसी के बारे में अक्सर सोचती हूँ, 

उसी को अपनी कल्पनाओं में खोजती हूँ, 

शख्सियत उसकी बनते देखती हूँ, 

जिसमें मैं अपना अक्स देखती हूँ ।


उम्मीदों को पर लगाकर उड़ते देखती हूँ, 

मन को सपने बुनते देखती हूँ, 

उसकी आवाजों को अक्सर सुनती हूँ, 

हर कहानी में उसका किरदार बुनती हूँ, 

इसीलिए तो हमेशा उसी को चुनती हूँ, 

जिसमें मैं अपना अक्स देखती हूँ ।


छत से उसको अक्सर झाँकती हूँ, 

उस रास्ते को हर पल ताँकती हूँ, 

हर वक्त उसी को सोचती हूँ, 

हर साँचे में उसको ढालती हूँ, 

और अपनी कल्पनाओं को सहराती हूँ, 

जिसमें मैं अपना अक्स देखती हूँ ।।