वह प्रथम सुबह
जीवन की 'माँ' ..
जब मैंने आखें खोली,
कुछ कुम्हलाया सा चेहरा,
थकी हुई सी बोली,
प्रथम दिवस कुछ
ऐसा ही था।
नहीं समझ पाई थी,
उस कुम्हलाये चेहरे का राज,
पर जान चुकी हूँ आज,
कितनी पीड़ा सह कर।
तुमने मुझको जनम दिया
जब मैंने भी वही वेदना झेली।।

