मकान फिर से। घर बन गए हैं।

एक दूसरे का ध्यान, प्यार, चिंता, मन में रम गए हैं।

जिंदगी ने फिर से उल्टी करवट ली, सोचने के लिए एक नई दिशा दी।

आज अपनों के बीच फिर से हम खिल गए हैं, मकान फिर से घर बन गए हैं।

इंसान ही नहीं प्रकृति भी आज मुस्कुराई है। प्रदूषण से मुक्त हो पाई है।

खिला हुआ आसमान, चांद ,तारों की चमक लौट आई है। सांस जब उस खुले आसमान की आगोश में ली तब लगा कि हवा भी शुद्ध होकर आई है।

पेड़ ,पौधे, फूल ,जानवर ,पहाड़ सब की रंगत लौट आई है। सच में प्रकृति भी खिल खिलाई है।