अंशुमाली सा सुंदर पैकर

क्लांत कमल सा पड़ा मही पर

मृतचेल, घृत चंदन देह पर

लाद चला सब पाप पुन्य वो

रूह चली है कासी तट पर


बिछी रह गयी चौपड़ देखो

उड़ चले पखेरू शाम के

मणिकर्णिका के घाट पर

खाली पड़े हैं पिंजरे चाम के।।


जोड़ जमाई, ठाठ धरे थे

गेह भीतर सोनतारे जड़े थे

अब नहीं रहे कुछ काम के

पाप की गठरी मुंशी खोले

संग जाऊंगी, बैरन बोले


नब्ज़ जो छूटी देह भी रूठी

पड़े रहे मखमल आराम के।।


मणिकर्णिका के घाट पर.....


नाते-रिश्ते नहीं कमाये

धन के पीछे जान लड़ाये

बद्री, द्वारिका जावत डोले

निज घट में ना झांका जाय


मैं के परदे पड़े अकल पर 

परा-अपरा खाली नाम के।।


मणिकर्णिका के घाट पर खाली पड़े हैं पिंजरे चाम के।।         


* अंशुमाली- सूरज

*मृतचेल -कफन

*गेह-घर

*परा-अपरा -विद्या


पूनम राजपूत