रात के अँधेरे में,

कितने राज़ छिपे होंगे,

सदियों की सैंकड़ो मुलाक़ाते,

हर राज़ समझते होंगे,

रातों -सी काली ये प्रथाएं,

आज भी ज़िंदा सभ्य समाज में,

समाज को असभ्य बना रही है,

बताना चाहती हूं मैं उस समाज को,

मेरे दम पर सांसे भरने वालों,

मुझको कमज़ोर समझने वालों,

आगाज़ हुआ है अंत मैं करूंगी

अंधेरों -सी इन प्रथाओं का,

कुरीतियाँ जो तुमने बना रखी है,

सहना नहीं अब लड़ना है मुझे,

मिटाना है अब तुम्हारे इस अहंकार को,

ख़त्म करना इस रात को है,

सूरज की पहली किरण से मुझको,

रात के अँधेरे में कितने राज़ छिपे होंगे,

पूजा सैनी