प्रकृति का उपहार हूँ मैं,
रंगों का गुमां हूँ मैं
फूलों की खुशबू भी मैं,
देवी का एक रूप भी मैं,
सफलता की हर कुंजी मैं,
हर घर की प्यारी बेटी मैं,
सुबह की उगती धूप हूँ मैं,
शाम की ढलती छांव हूँ मैं,
सूरज की जलती आग हूँ मैं,
चन्द्रमां की शीतलता हूँ मैं,
हवा की तेज़ रफ़्तार हूँ मैं,
हर घर की प्यारी बेटी मैं,
प्यार नहीं फिर करता कोई क्यों मुझसे,
धरती पर आने नहीं देते मुझको,
जब धरती का सम्मान हूँ मैं,
जन्म लेते ही सोचने लगते,
भगवान ने दी ये मुसीबत क्यों,
जब भगवान की हर एक जान हूँ मैं,
कचरे में डालते,
नदी में फेकते,
जबकि नदी की हर एक धार हूँ मैं,
बेटे को खूब प्यार देते पर,
बेटी से मुँह मोड़ लेते है,
पेट भर खाना कभी नहीं मिलता,
वरना अच्छे खाने को तरसती हूँ मैं,
ताने सहकार भी रह जाती,
घर का अभिमान बचाती हूँ मैं,
हर घर की प्यारी बेटी हूँ मैं,
जैसे - जैसे मैं बड़ी हूँ होती,
शिक्षा से वंचित कर देते,
जबकि स्वयं सरस्वती हूँ मैं,
धन में जो मुझको है तोलते,
दहेज़ प्रथा से शर्मिंदा करते,
पृथ्वी की हर एक आन को जो,
जानते नहीं शायद वो ये की
लक्ष्मी का एक रूप हूँ मैं,
डालते जो मुझपर बुरी दृष्टि,
हर एक पल पीछा है करते,
ज्ञान नहीं शायद ये उनको,
महिषासुर को जिसने मारा,
सती का दुर्गा रूप हूँ मैं,
हर घर की प्यारी बेटी मैं,
एक बार धरती पर आने दो मुझको,
मुसीबत ना मानकर संतान तो मानो,
हर घर को पवित्र बना दूंगी मैं,
बेटों को तुम प्यार दो पर,
मुझको प्यार कम देना गलत है,
एक बार शिक्षा देकर तो देखो,
समाज को शिक्षित बना दूंगी मैं,
हर घर की प्यारी बेटी मैं,
दौलत से नहीं संस्कार से तोलो,
पलड़ा भारी मिलेगा मेरा,
शरीर को नहीं आत्मा को पूजो,
सम्मान देना हर स्त्री को जानो,
क्योंकि वंश आगे बढाती हूँ मैं,
जीवन भर प्यार चाहती हूँ मैं,
हर घर की प्यारी बेटी हूँ मैं,
हर घर की प्यारी बेटी हूँ मैं,
पूजा सैनी


