समय कितना अजीब है,
हर कोई गरीब है,
कोई रिश्तों से, कोई ऐशो से,
हर कोई हर एक साँसो से,
पर ये कहना अजीब है,
हर कोई गरीब है,
मन का एक साया जो,
निगल रह नसीब है,
आते दिन, कहते, जाते है,
संभाल लो इस रुत को तुम,
पिघल रहा शरीर है,
आग धरती में, आग सूरज में,
जलाता आया आकाश को है,
पर्वत ने जल का जीवन सींचा है,
पाया फिर सागर ने उसको क्यों ?
समय कितना अजीब है,
हर कोई गरीब है,
पूजा सैनी


