कितना अच्छा होगा गर,
एक कदम रास्ते की ओर,
एक कदम मंज़िल के पास,
और मंज़िल सामने आ जाए,
सिर्फ दो कदमों की ये दूरी
ओर मंज़िल के ले जाए,
मंज़िलों के निशां पहचानकर,
रास्ते खुद ही बन जाए,
बल, सामर्थ्य और शक्ति का,
गिरफ्त सोच को आज़ाद कराकर,
एक कदम रास्ते की ओर,
एक कदम मंज़िल के पास,
और मंज़िल सामने आ जाए,
ज़ाहिर है, ठोकर लगेगी तुझको,
दो क़दमों की मंज़िल तो क्या,
राहगीरों के कदम भी नहीं होते,
पर आहट चलते पर्दों की,
एक कदम मंज़िल के पास,
पर मूल्य मंज़िल का तो,
दो ही कदम वाकई है,
नज़रिया मुसाफ़िर का तो बनाओ,
एक कदम रास्ते की ओर,
एक कदम मंज़िल के पास,
मंज़िल निहारती खुद का ही रास्ता,
देखो राह को मंज़िल के जैसे,
रास्ता खुद ही मंज़िल बन जाए,
सिर्फ दो क़दमों की दूरी,
ओर मंज़िल के ले जाए,
कितना अच्छा होता गर,
एक कदम रास्ते की ओर,
एक कदम मंज़िल के पास,
ओर मंज़िल सामने आ जाए,
पूजा सैनी


