
कुदरत का भी अजब दस्तूर है !
जिससे तमन्ना थी बेइंतेहा,रूबरू होने की,
वही सनम हमसे खफा और बहुत दूर है,
मिन्नतें की खुदा से उसे पाने की,अपनी शरीक-ए-हयात बनाने की,
वही अपनों को छोड़ किसी गैर संग मसरूर है,
कुदरत का भी अजब दस्तूर है !!
जिसे चाहा बेतहाशा,उसी पर छाया किसी और की हसरत का फ़ितूर है,
हमने की सच्ची वफा,जो
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