बरखा-सी इठलाती, लोगों को हर्षाती; सौम्यता भरी कलियों-सी, घर पधारी सुनहरी परी।   माँ-बाप की यों दुलारी, जीवन से ज्यादा प्यारी; अंतर में सभी के बसती, खुशियों का गीत रचती; घर पधारी सुनहरी परी।   संघर्ष-भरे क्षण को भी, मौका-ए-खास बनाती; जिंदगी के विषाद को, मुस्कान से यह हर लेती; प्रेमभावी गुलशन संग लाती, घर पधारी सुनहरी परी।   ज्यों विदा हुई पीहर को, कैसे संभाले पिता स्वयं को? आज रुसवा हो गई उसकी, घर पधारी सुनहरी परी।