कुछ हार जीत से दूर कहीं,
जज़्बातों से मजबूर कहीं।
कुछ दूर दूर कुछ पास पास,
कुछ खुद में खुद की ही तलाश।
जगती आँखों के ख़्वाब सा भी,
धड़कन धड़कन बेताब सा भी।
कुछ अनसुलझे बिखरे सवाल,
थोड़ी हैरत थोड़ा मलाल।
बेवजह ख़याली बातों सा,
कुछ सहमी सहमी रातों सा।
कुछ सतरंगी ,बेरंग सा भी,
कुछ एहसासों के जंग सा भी।
धुंधले धुंधले एहसास सा है,
कुछ ग़ैर सा है, कुछ ख़ास सा है।
पुरजोर असर ये कुछ तो है,
ये इश्क़ नहीं, पर कुछ तो है।