जंग ,,

कौन है ये ,क्या है ये ,क्यों है ये,किसके लिए है और किससे है ,

ये तमाम प्रश्न मेरे जहन के पहले छोर से लेकर आख़री छोर तक उठ तो रहे है पर सब अर्थहीन है । जंग असल में उन क़ौमे के बीच है जहाँ मैं और तुम हैं ।

हम कमरे में दो लोग रहते है एक शान्ति के छोर से है और दूसरे अशांति की गोद से ।

महज हम दोनों में ज्यादा अंतर तो नही बस वो शान्त है और मैं अशांत ,,,

वो अपनो के बारे में सोच-सोच कर विचारों में डूबी है और मैं सुन-सुनकर , देख-देख कर जोश और उन्माद की नाव में बहती जा रही हूँ एक अपाहिज की तरह ,

उस अपाहिज की तरह जो मुझसे अपरिचित है, मेरी मानसिकता से अलग है और मुझसे अनभिज्ञ है पर फिर भी मैं विचलित धाराओं में बह रही हूँ जहाँ मुझे न तो बोलने की सुध है और न ही रुकने की ।

वो अपनो को और उनकी यादों में खुद को बिखरते हुए देख रही है अपनो सपनो में!

जो सच होंगे कि नही पर सच से भी भयानक है ये देखना!!

वो देख रही है खुद को उस टंगी हुई मानवता पर

झूलते हुए इंसानियत के बीजो पर ।

हर दो पल में उसकी धड़कन फोन के रिंग की तरह बज रही है 

ट्रिग-ट्रिग- ट्रिग-ट्रिग

फ़ोन उठाने के बाद होंठ उन लफ्ज़ो को दोहरा -दोहरा कर परेशान हो गए ,,,,, की सब ठीक तो है न 

दूसरी तरफ से आने वाले वो लफ़्ज़ सन्नाटो के खेतों से गुज़र रहे थे कि हाँ,, सब ठीक ही है।

और मैं उन्माद की सीढ़ी को चढ़ रही थी जोश की गरिमा समझ कर क्योंकि मैं उत्तराखंड से हुँ और वो कश्मीर से।



  जंग से जज्बातों तक 


- poet girl of mountains