उम्र बढे तो घट जाओ तुमचंदा सा बस आधा होकरअँधेरे को मिटा ही दोगे तुमसुबह की उजली किरण बनकरहर हार -जीत के बीच मेंउम्मीद की रेखा रहती हैतुम उस लकीर पर बने रहोजीवन की राह यही कहती है
उम्र बढे तो घट जाओ तुमचंदा सा बस आधा होकरअँधेरे को मिटा ही दोगे तुमसुबह की उजली किरण बनकर
हर हार -जीत के बीच मेंउम्मीद की रेखा रहती हैतुम उस लकीर पर बने रहोजीवन की राह यही कहती है