मुझे यह पसंद है कि

जब आप कविताओं को अपनी तरफ झुकाते हैं तो

वे बहुत दूर से लघु शहरों की तरह दिखती हैं।

शब्दों से बनी गगनचुंबी इमारतें

अपनी अलग ही पहचान बना लेती हैं

उनकी उंचाई अधिक होते हुए भी  

जब हम हाथों से से छूकर

उन तक पहुंचना चाहें

तो बड़ी आसानी से सतह पर

चाहनेवलों तक झुकी दिख जाती हैं

ताज्जुब ये कि उनकी ऊंचाइयों से अधिक  

उनकी गहराइयां आकर्षित करती हैं 

मुझे शब्दों से बने जालों में

उधेड़बुन पसंद है

ये फंसा कर उलझाती नहीं है

बल्कि उलझी गिरहों को

सलीके से सुलझाती हैं