मुझे यकजा करने की बहुत कोशिश की मगर

मैं बिखरा हूँ कि बिखरा ही रह जाऊँगा।


मेरे हिस्से की ख़ुशी को मैंने उसके नाम किया

मेरा क्या है, मैं तो यूँ ही बसर कर जाऊँगा। 


मेरे ख़्वाब-ए-सहर में उसका ज़िक्र न होता है अब

हुआ ज़िक्र अगर तो मैं बेसबब ही मर जाऊँगा।


शब-ए-फ़िराक़ की यादें, ताज़ा अब भी है मगर

मैं तग़ाफ़ुल की चादर ओढ़े, माज़ी को भूल जाऊँगा। 


मुख़्तसर मुलाकात की हसरत भी ना रही अब

मैं दिल को अब और कुशादा नहीं कर पाउँगा।